सोमवार, 6 जनवरी 2014

व्यंग्य: मारकेट में नया भगवान आया है (Market mein naya bhagwaan aaya hai)

टीवी पर अक्षय कुमार और परेश रावल की "ओ माय गॉड" चल रही थी। देखते-देखते एक जुड़ाव सा लग रहा था, साथ ही चेहरे पे एक मुस्कान सी थी, एक व्यंग्यात्मक मुस्कान। वो सीन बड़ा अच्छा लगा कि भाई ईश्वर कि आराधना न हुई व्यापर हो गया। भगवान SSC कि परीक्षा में पास करा दो, पांच मंगलवार सिद्धि विनायक चल कर आऊंगा। भगवान मेरी पसंद कि लड़की से शादी करा दो, 101 नारियल चढ़ाऊंगा। तिरुपति में बाल दान कर आए और सोचो ज़रा, भगवान् इन बालों का क्या करते होंगे? सुबह-सुबह घर का दरवाज़ा खोला और क्या देखते हैं, बाल ही बाल, सफ़ेद बाल, काले बाल, सीधे बाल घुंघराले बाल, डैंडरफ वाले बाल, जुएँ वाले बाल।  मन में विचार आया, सचमुच दिन बन गया होगा भगवान् का। अलग से नगरपालिका बिठानी पड़ी होगी भगवान् को। और पोंगे-पंडितों की भगवान् पर कॉपीराइट वाली बात ने तो दिल जीत लिया, सच ही तो दिखाया है इस फ़िल्म में। 

पिछले साल जब मैं छुट्टियों में घर गयी थी तो मेरी माँ बड़ी परेशान थीं। रोज़ पंडित-ब्राम्हणो का आना जाना लगा रहता था। भैया की कुंडली दिखाकर सबसे यही पूछती रहती " पंडित जी, छोरे का ब्याह न हो रहा है, नौकरी चाकरी भी ज्यादा अच्छी नहीं है, पैसे भी कम देते हैं और मेनेजर भी सर पर बैठा रहता है, रात-रात भर काम में लगा रहता है मेरा छोरा, कुछ उपाय बताइए " और पंडित जी भी किसी बुद्धिजीवी  सर्वज्ञानी की तरह सुनकर मेरे बेचारे भाई की कुंडली में सारे ब्रम्हांड के ग्रह नक्षत्र उतार लाते।  पांच हज़ार एक रुपये पर बात तय कर दी की ग्रह शांति पूजा कराएँगे और गारंटी भी दे दी कि मेनेजर तंग न करेगा। मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया " डायरेक्ट सपने में जाकर मेनेजर को डराये आओगे क्या कि अविनाश कुमार जी को तंग न करे, आपका शागिर्द है। " पंडित जी तमतमा गए और माँ को बोले "ये कैसी उदंड छोरी है, हमे तो आप इज़ाज़त ही दीजिए।" माँ बड़े ही बेबस आखों से पंडित जी के सामने हाथ जोड़कर बैठ गई।  "नादान है बाबा " कहकर मुझे वहाँ से चलता कर दिया।  माँ जब बाबाजी को भेजकर आयी तो ये कहे बिना रहा न गया "ये पंडित जी तो एक ही बॉल में क्लीन बोल्ड हो गए। "

अगली सुबह माँ ने सवेरे पाँच बजे उठा दिया।  मुझे लगा कुछ बात हो गई। कमरे से बाहर निकली तो देखा हॉल में सब टीवी के सामने हाथ जोड़े बैठे हैं।  उन दिनों की याद आ गयी जब टीवी का ज्यादा चलन न था, मोहल्ले के एक घर में टीवी हुआ करता था और जब महाभारत आता तो पुरे मोहल्ले के लोग सारा काम छोड़कर हाथ जोड़े टीवी के सामने बैठ जाया करते थे। लगा कहीं सपना तो नहीं देख रही मैं? तभी कानो में कुछ स्वर फूटे "समोसा खाते हो?" "जी, खाते हैं।" "चटनी के साथ खाते हो?" "नहीं बाबाजी, अच्छी नहीं लगती।" "तो कृपा कैसे आएगी? इसी चटनी ने कृपा रोक के रखी है, जाओ समोसा चटनी के साथ खाओ, कृपा आनी शुरू हो जायेगी।" सुनकर लगा कि ये क्या है, ये सब लोग समोसा चटनी खाने सुबह-सुबह टीवी के सामने हाथ जोड़े बैठे हैं? अब तक मैं भी टीवी क सामने पहुँच गयी थी। पर देखा, ये कोई नए बाबा का प्रवचन था।  मैं गुस्से से माँ को बोली "क्या है ये माँ, आप ये दिखने सुबह-सुबह उठाकर लायीं हैं मुझे और इसके लिए यहाँ पूरी मंडली जमा राखी है? पिछली बार भी कोई बाबा-वाबा को भजती थी ना आप, क्या कच्चा चिट्ठा निकला उनका? पर माँ ने बड़े प्यार और सरलता से कहा "सुन ले बेटा, कुछ भला ही हो जाएगा। " लगा सचमुच, कैसी होती हैं ये माएँ, बच्चों कि भलाई के नाम पर कोई भी उनको ठग लूट सकता है।  सोचकर अच्छा लगता है कि इतना स्नेह करती हैं हमसे मगर कोई भी इसका फायदा उठाये ये अच्छा नहीं लगता। खैर, माँ के लिए मैं भी उन बाबाजी के प्रवचन सुनने लगी। इनकी बातें बाकियों जैसी ही थी मगर समस्याओं के उपाय नए लग रहे थे और थोड़े अजीब भी। समोसा चटनी के साथ खाओ, खाने के बाद हाथ रुमाल से पोछो, लक्ष्मी चाहिए तो हर साल नया मँहगा पर्स खरीदो, बीबी-को सिनेमा ले जाओ, मंदिर में पचास नहीं पांच सौ चढ़ाओ। किसी ने कहा -"बाबाजी, डाक्टरी कि परीक्षा में बार बार फेल हो जाता हूँ, कुछ उपाय बताओ। "इसपर बाबाजी कहते हैं, "अपनी सभी कॉपी किताबों पर राम जी का नाम लिखो और परीक्षा में भी उन्हें याद करके ही प्रश्न पत्र हल करो, इस बार पास हो जाओगे। " मैं मन ही मन हंस पड़ी, सोची कि अगर राम का नाम लेकर बिना पढ़े लिखे ही परीक्षा में पास हो गए तो इस देश क मरीजो का राम नाम सत्य होने से तो राम भी न बचा सकेंगे। खैर, मुझे मालुम था कि उठकर जाने और माँ से बहस करने का कोई फायदा नहीं होगा। 

मेरी छुट्टियों की हर सुबह ऐसी ही गुज़र रही थी, ऊँघते-आंघते आधी आखें खोलकर बाबाजी का प्रवचन सुनती।  बाबाजी कह रहे थे कि कमाई का दस प्रतिशत उनकी कोष में जमा करा दीजिये। मेरे मुंह से निकल गया, "लो भाई, बाबाजी के श्रद्धालुओं के लिए नया इनकम टैक्स " माँ बगल में बैठी थी, एक तड़ी माथे पर जड़ दी, और मेरे मुँह से फिर निकल गया "और साथ ही पाएं माता का आशीर्वाद, मुफ्त,मुफ्त,मुफ्त।" इसी के साथ हम फिर से बाबाजी के प्रवचनो में लीन हो गए। तीसरे दिन जब आँखें मिचती मैं सुबह उठी तो लगा काश आज बिजली चली जाए, एक दिन तो मैं चैन कि नींद सो सकूँ। जिंदगी झंड हो गयी थी, काम के दिन काम और छुट्टियों में बाबाजी के प्रवचन।  और उसपर माँ रे माँ (बाप रे बाप कि जगह आज कल विषम परिस्थितियों में माँ रे माँ मेरा चाहिता शब्द हो गया था। ) 

ख़ैर, बाबाजी आज भी बोले, मेरे ज्ञान के चक्षु खोले, मेरे अंदर से कविता फुट रही थी, मेरी सुबह कि प्यारी नींद छूट रही थी। :P :D :) आज बाबाजी के कुछ अनुयायी कहते हैं, "बाबाजी, मेरा जीवन कष्टों से भरा था पर जबसे टीवी पर आपको सुनने लगा, मेरे जीवन की समस्याओं का समाधान होने लगा है। आज आपके साक्षात् दर्शन भी हो गए।" इसपर बाबाजी बड़ी सरलता से पुष्टिकरण करते हुए कहते हैं, "आप तो यहाँ आ गए, कृपा तो जानी ही है, जो लोग टीवी भी देखते हैं उनपर भी बाबाजी की कृपा जानी शुरू हो जाती है।  अब मेरे मन का गुबार मन में बंद न रह सका।  मैंने कहा " बाबाजी की कृपा सूरज की किरणो जैसी हैं, खिड़की खोलो तो पड़ ही जाएँगी, वैसे ही टीवी खोलो तो कृपा पड़ ही जायेगी।" ये माँ के सब्र की अति थी, वो पुरे दिन मुझसे नाराज़ रही और मेरी छुट्टियों का बेड़ा गर्क हो गया। 

पास के बड़े शहर में बाबाजी का दरबार लगने वाला था और माँ ने ज़िद पकड़ ली कि उसे जाना ही है।  मैंने उसे समझाया, पर सच तो ये है कि बाहर इंसान अपनी बुध्धिजीवी होने की कितनी भी कीर्ति फैला ले, माँ के सामने कभी किसी कि चली है क्या? मैंने भी टोल फ्री नंबर पर फ़ोन कर सभा में जाने कि जानकारी ली, पता चला कि पीछे कि सीट क १००० रूपए, बिच के ३००० और आगे के ५००० और बाबाजी से पर्सनल अपॉइंटमेंट के २५०००। 
रहा न गया तो मैंने भी पूछ लिया, १-२ लाख में डायरेक्ट भगवान् जी से साक्षात्कार भी करवाते हैं क्या? दूसरी तरफ से फ़ोन रख दिया गया।मैंने सोचा अच्छा कारोबार है, हम तो बेकार में ही सारा दिन दफ्तर में कलम घसते हैं।  मैंने माँ को समझाने की कोशिश की कि जब टीवी से कृपा आ ही रही है तो वहाँ जाने कि क्या जरुरत है, पर मेरी सुनने वाला कौन था। आखिर मुझे टिकट करवानी पड़ी। 

दो दिन बाद मुझे वापिस दफ्तर ज्वाइन करना था सो मैं अगली सुबह घर से अपने गंतव्य के लिए निकल पड़ी।  कुछ दिनों बाद न्यूज़ चैनल्स से बाबाजी के बारे में काफी कुछ सुनने को मिला।  मैंने भी मौके पे चौका मारा और माँ को फ़ोन करके समझाया कि इन सब में न पड़ा करे।  पर कल ही माँ का फिर फ़ोन आया , किसी नए बाबा के गुणगान कर रही थी।  मैंने भी बड़ी धीरता से कहा - अच्छी ठगई लगा रखी है बाबाओं ने भी। 

इसपर मुझे ओ माय गॉड का वो सीन फिर याद आ गया, जब सारे ढोंगी पंडित मिलकर काँजी
(परेश रावल) को भगवान बना देते हैं, "जय काँजी वाला प्रभु जय काँजी वाला " की भजने गाते हैं और कोई कहता है - ये ४०० करोड़ तो एक साल में वसूल हो जाएगा, मार्केट में नया भगवान् जो आया है। 

ऐसे लोग जो इतना चढ़ावा देते हैं, उनसे एक प्रश्न है, क्या भगवन आपके चढ़ावे के भूखे हैं ? किसी कि कही हुई वो दो पंक्तियाँ याद आ रही हैं - " चढ़ती थी उस मज़ार पर चादरें बेशुमार, बहार बैठा वो गरीब सर्दी से मर गया। "



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